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Sunday, 21 November 2010

तुम तो ठहरे परदेसी : अल्ताफ राजा

तुम तो ठहरे परदेसी, साथ क्या निभाओगे...
तुम तो ठहरे परदेसी, साथ क्या निभाओगे...

सुबह पहली... सुबह पहली... सुबह पहली... गाड़ी से घर को लौट जाओगे...

तुम तो ठहरे परदेसी साथ क्या निभाओगे...

जब तुम्हें अकेले में मेरी याद आएगी...
जब तुम्हें अकेले में मेरी याद आएगी...

खीचें खीचें हुए रहेतीं हो क्यों...
खीचें खीचें हुए रहेतीं हो ध्यान किसका हैं...
ज़रा बताओ तो यह इम्तिहान किसका हैं...
हमें भुला दो मगर यह तो याद ही होगा... हमें भुला दो मगर यह तो याद ही होगा...
नयी सड़क पे पुराना मकान किसका हैं...

जब तुम्हें अकेले में मेरी याद आएगी...
आसुओं की... आसुओं की...
आसुओं की बारिश में तुम भी भीग जाओगे...
आसुओं की बारिश में तुम भी भीग जाओगे...

गम के धूप में दिल की हसरतें ना जल जाए...
गम के धूप में दिल की हसरतें ना जल जाए...

तुझको यह तुझको देखेंगे सितारें तो ज़िया माँगेंगे...
तुझको देखेंगे सितारें तो ज़िया माँगेंगे...
और प्यासे तेरी ज़ुल्फो से घटा माँगेंगे...
अपने काँधे से दुपपता ना सरकने देना...
वरना बूढ़े भी जवानी की दुवा माँगेंगे...
ईमान से...

गम के धूप में दिल की हसरतें ना जल जाए...
गम के धूप में दिल की हसरतें ना जल जाए...

गेसुओ के... गेसुओ के... साए में कब हमें सुलाओगे...
गेसुओ के... गेसुओ के... साए में कब हमें सुलाओगे...

तुम तो ठहरे परदेसी, साथ क्या निभाओगे...

मुझको कत्ल कर डालो शौक से मगर सोचो...
मुझको कत्ल कर डालो शौक से मगर सोचो...

इस शहरे नामुराद की इज़्ज़त करेगा कौन...
अरे हम ही चले गये तो मोहब्बत करेगा कौन...
इस घर की देखभाल को वीरानियाँ तो हो..
जाले हटा दिए तो हिफ़ाज़त करेगा कौन...

मुझको कत्ल कर डालो शौक से मगर सोचो...
मेरे बाद... मेरे बाद... तुम किस पर ये बिजलियाँ गिरावगे...

तुम तो ठहरे परदेसी, साथ क्या निभाओगे...

यू तो ज़िंदगी अपनी मयकदे में गुज़री हैं...
यू तो ज़िंदगी अपनी मयकदे में गुज़री हैं...

अश्को में हुसनो रंग समेट रहा हू मैं...
आँचल किसी का थाम के रोता रहा हू मैं...
निखरा हैं जाके अब कही चेहरा शहूर का...
बरसो इसे शराब से धोता रहा हू मैं...

यू तो ज़िंदगी अपनी मयकदे में गुज़री हैं...
बहकी हुई बहार ने पीना सीखा दिया...
बदमस्त बरगो बार ने पीना सीखा दिया...
पीता हूँ इस गरज से के जीना हैं चार दिन...पीता हूँ इस गरज से के जीना हैं चार दिन...
मरने के इंतेजार ने पीना सीखा दिया...

यू तो ज़िंदगी अपनी मयकदे में गुज़री हैं...
इन नशीली... इन नशीली... इन नशीली... आँखों से कब हमें पीलाओगे...
इन नशीली आँखों से कब हमें पीलाओगे...
तुम तो ठहरे परदेसी, साथ क्या निभाओगे...

क्या करोगे तुम आख़िर क़ब्र पर मेरी आकर...
क्या करोगे तुम आख़िर क़ब्र पर मेरी आकर...

क्यों के जब तुमसे इतेफ़ाक़न... जब तुमसे इतेफ़ाक़न... मेरी नज़र मिली थी...
अब याद आ रहा हैं... शायद वो जनवरी थी...
तुम यूँ मिली दुबारा... फिर माहे फ़रवरी में...
जैसे के हमसफ़र हो... तुम राहें ज़िंदगी में...
कितना हसीन ज़माना... आया था मार्च लेकर...
राहें वफ़ा पे थी तुम... वादों की टॉर्च लेकर...
बाँधा जो अहदे उलफत... अप्रैल चल रहा था...
दुनिया बदल रही थी... मौसम बदल रहा था...
लेकिन माई जब आई... जलने लगा ज़माना...
हर श्कस की ज़बान पर... था बस यही फसाना...
दुनिया के दर्र से तुमने... बदली थी जब निगाहें...
था जून का महीना... लब पे थी गर्म आहें...
जुलाई में जो तुमने... की बातचीत कुछ कम...
थे आसमान पे बादल... और मेरी आँखें पूरनम...
माहे अगस्त में जब... बरसात हो रही थी...
बस आसुओं की बारिश... दिन रात हो रही थी...
कुछ याद आ रही हैं... वो माह था सितंबर...
भेजा था तुमने मुझको... करके वफ़ा का लेटर...
तुम गैर हो रही थी... ओक्टूबर आ गया था...
दुनिया बदल चुकी थी... मौसम बदल चुका था...
जब आ गया नवंबर... ऐसी भी रात आई...
मुझसे तुम्हें छुड़ाने... सजकर बारात आई...
बेखैफ़ था दिसंबर... ज़ज्बात मार चुके थे...
मौसम था सर्द उसमें... अरमान बिखर गये थे...

लेकिन यह क्या बताउन अब हाल दूसरा हैं...
लेकिन यह क्या बताउन अब हाल दूसरा हैं...

लेकिन यह क्या बताउन अब हाल दूसरा हैं...
अरे वो साल दूसरा था यह साल दूसरा हैं...


क्या करोगे तुम आख़िर क़ब्र पर मेरी आकर...
थोड़ी देर... थोड़ी देर... थोड़ी देर... रो लोगे और भूल जाओगे...

तुम तो ठहरे परदेसी साथ क्या निभाओगे...
तुम तो ठहरे परदेसी साथ क्या निभाओगे...

सुबह पहली गाड़ी से घर को लौट जाओगे...
सुबह पहली गाड़ी से घर को लौट जाओगे...

Saturday, 20 November 2010

कैसे बताऊं मै तुम्हे मेरे लिए तुम कौन हो?

कैसे बताऊं मै तुम्हे मेरे लिए तुम कौन हो?
कैसे बताऊँ...कैसे बताऊँ मै तुम्हे तुम
धडकनों का गीत हो जीवन का संगीत हो
तुम जिंदगी तुम बंदगी तुम रोशनी तुम ताजगी
तुम हर ख़ुशी तुम प्यार हो मनमीत हो
आँखों में तुम यादों में तुम सासों में तुम
आहों में तुम नींदों में तुम ख्वाबों में तुम
तुम हो मेरी हर बात में तुम हो मेरे दिन रात में
तुम सुबह में तुम शाम में तुम सोच में तुम काम में
मेरे लिए पाना भी तुम मेरे लिए खोना भी तुम
मेरेलिए हंसना भी तुम मेरे लिए रोना भी तुम
और जागना सोना भी तुम
जाओ कहीं देखो कहीं तुम हो वहां तुम हो वहीं
कैसे बताऊँ मै तुम्हे तुम बिन तो मै कुछ भी नहीं
कैसे बताऊँ मै तुम्हे मेरे लिए तुम कौन हो
ये जो तुम्हारा रूप है ये जिन्दगी की धुप है
चन्दन से तराशा है बदन बहती है जिसमें एक अगन
ये शोखियाँ ये मस्तियाँ तुमको हवाओंसे मिलीं जुल्फें घटाओसे मिली
हाथों में कलियाँ खिल गई आँखों को झील मिल गई
चेहरे में सिमटी चांदनी आवाज में है रागिनी
शीशे के जैसा अंग है फूलों के जैसा रंग है
नदियों के जैसी चाल है क्या हुस्न है क्या चाल है
ये जिस्म की रंगीनियाँ जैसे हजारों तितलियाँ
बाँहों की यह गोलाइयाँ आंचलमें यह परछाइयां यह
नगरियाँ है ख्वाब की कैसे बताऊँ मै तुम्हे हालत दिले बेताब की
कैसे बताऊँ मै तुम्हे मेरे लिए तुम कौन हो
कैसे बताऊँ कैसे बताऊँ कैसे बताऊँ मै तुम्हे मेरे लिए तुम धरम हो
मेरे लिए ईमान हो तुमही इबादत तुम ही तो चाहत हो मेरी
तुमही मेरा अरमान हो तकता हूँ मै हर पल जिसे
तुमही तो वो तस्वीर हो
तुमही मेरी तक़दीर हो तुमही सितारा हो मेरा
तुम ही नजारा हो मेरा यूँ ध्यान में मेरे हो तुम जैसे मुझे घेरे हो तुम
पूरब में तुम पश्चिम में तुम उत्तर में तुम दक्षिण में तुम
सारे मेरे जीवन में तुम हर पल में तुम हर चिर में तुम
मेरे लिए रास्ता भी तुम मंझिल भी तुम सागर भी तुम साहिल भी तुम
मै देखता बस तुमको हूँ सोचता बस तुमको हूँ
मै जानता बस तुमको हूँ मै मानता बस तुमको हूँ
तुमही मेरी पहचान हो कैसे बताऊँ मै तुम्हे देवी हो तुम मेरे लिए भगवान् हो कसे बताऊँ
कैसे बताऊँ मै तुम्हे मेरे लिए तुम कौन हो कैसे बताऊँ......


 फिल्म: वजूद
संकलक और हिंदी रूपांतर: प्रवीण कुलकर्णी


हंस-दमयंती

हंस-दमयंती

असंही असतं!!

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Hi.. I am Pravin and I am an alcoholic....